अमित मिश्रा ने छलके इरफान पठान के साथ 'संविधान' विवाद पर अपने विचार

अमित मिश्रा ने छलके इरफान पठान के साथ 'संविधान' विवाद पर अपने विचार

अमित मिश्रा और इरफान पठान: एक विवाद की गहराई

पूर्व भारतीय क्रिकेटरों के बीच विवाद कोई नई बात नहीं है, लेकिन अमित मिश्रा और इरफान पठान का मामला एक अलग दिशा में बढ़ा। यह शुरुआत तब हुई जब इरफान पठान ने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट डाली जिसमें उन्होंने देश की बेहतरी पर सवाल उठाए। पठान ने लिखा, 'मेरा देश, मेरा खूबसूरत देश, दुनिया का सबसे महान देश बनने की क्षमता रखता है। लेकिन...' इस पोस्ट के बाद अमित मिश्रा ने एक टिप्पणी करते हुए लिखा कि भारत वास्तव में दुनिया का सबसे महान देश बन सकता है, यदि लोग यह समझें कि संविधान वह पहली किताब है जिसे उन्हें पढ़नी चाहिए।

संविधान पर बहस: विवाद की जड़

संविधान और देशप्रेम पर इस बहस ने सोशल मीडिया पर बड़ी हलचल मचा दी। अमित मिश्रा की टिप्पणी को व्यापक रूप से साझा किया गया और इस पर लोगों की प्रतिक्रियाएं मिली-जुली रहीं। कुछ ने मिश्रा का समर्थन किया, तो कुछ ने इसे इरफान पठान पर अनावश्यक हमला माना। मुद्दा और गंभीर तब हो गया जब मिश्रा ने स्पष्ट किया कि उन्होंने इरफान पठान को कभी गले नहीं लगाया था, यह बताते हुए कि उनके बीच खटास बनी हुई है।

क्रिकेट से परे: विचारधारा की टकराहट

क्रिकेट से परे: विचारधारा की टकराहट

इस घटनाक्रम ने यह स्पष्ट कर दिया कि भारतीय क्रिकेट में भी मतभेद और विचारधारा के टकराव कितने गहरे हो सकते हैं। यह केवल खेल नहीं है, बल्कि खिलाड़ियों के निजी विचारों और आस्थाओं का भी मामला है। अमित मिश्रा के लिए, देश का संविधान एक पवित्र दस्तावेज़ है और उन्होंने यह बात खुलकर कही।

आलोचनाओं का सामना

अमित मिश्रा को अपनी टिप्पणी के लिए काफी आलोचना का सामना करना पड़ा। 2022 में दी गई इस टिप्पणी पर उन्हें कई दिशाओं से विरोध मिला, लेकिन मिश्रा अपनी बात पर स्थिर रहे। उन्होंने कहा कि उन्होंने जो कहा वह उनकी गहरी आस्था और समझ का हिस्सा था। इसी सिलसिले में उन्होंने स्पष्ट किया कि उनके और इरफान पठान के बीच कोई व्यक्तिगत दुश्मनी नहीं है,बस विचारधारात्मक असहमति है।

आगे का रास्ता

आगे का रास्ता

यह पूरा प्रकरण यह दर्शाता है कि खेल और विचारधारा का मिश्रण कभी-कभी कितना विस्फोटक हो सकता है। यह घटना भारतीय क्रिकेट के प्रशंसकों को यह सोचने पर मजबूर कर देती है कि एक खिलाड़ी की भूमिका, न केवल मैदान में बल्कि बाहर भी, कितनी महत्वपूर्ण होती है। आज जब हमारे देश में विचारधारा की लड़ाई चरम पर है, तब ऐसे प्रकरण और अधिक संवेदनशील हो जाते हैं।

आखिरकार, यह देखना होगा कि क्या इस विवाद का कोई ठोस समाधान निकलता है या यह और बढ़ता है। उम्मीद है कि दोनों खिलाड़ी खेलने के गोले के बाहर भी अपनी पहचान बनाए रखेंगे और विचारधारा के इस संघर्ष को कहीं न कहीं हल करेंगे।

  • Pooja Joshi

    इनके सभी पोस्ट देखें:

12 टिप्पणि

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    Ayush Sharma

    जुलाई 19, 2024 AT 02:54

    संविधान पढ़ो, बस। क्या इतना मुश्किल है? देश का नाम लेकर भावुक होने से पहले, उसकी रूपरेखा समझो।

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    Nathan Allano

    जुलाई 20, 2024 AT 10:01

    अरे भाई, ये सब बहस तो बहुत बेकार है... अमित मिश्रा जी कह रहे हैं कि संविधान पढ़ो, और इरफान जी कह रहे हैं कि देश प्यारा है... दोनों बातें सही हैं! लेकिन जब एक आदमी कहता है कि 'तुम्हारा देश बेकार है', तो दूसरा गुस्सा हो जाता है... लेकिन अगर दोनों एक साथ बैठकर चाय पीकर बात कर लें, तो सब ठीक हो जाएगा! 😊

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    Guru s20

    जुलाई 21, 2024 AT 14:09

    मैं तो सोचता हूँ कि ये दोनों खिलाड़ी अपनी बात तो रख रहे हैं, लेकिन जो लोग इसे अपनी राजनीति में घोल रहे हैं, वो सच में बेकार हैं। खेल तो खेल है, जिसमें जीत-हार होती है, लेकिन देश के लिए जो बातें हैं, उनके लिए तो एक दूसरे को नहीं, बल्कि अपने आप को समझना चाहिए।

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    Raj Kamal

    जुलाई 21, 2024 AT 16:47

    अरे यार, मैंने तो संविधान की 100 पेज वाली बुक खरीदी थी पर तीन दिन में ही उसे बेच दिया क्योंकि मैंने समझा कि अगर मैं इसे पढ़ूंगा तो मुझे अपने दोस्तों से बात करने के लिए अलग शब्द याद करने पड़ेंगे जैसे 'साम्यवाद', 'धर्मनिरपेक्षता', 'मूल अधिकार'... और फिर मैं जब उनसे बात करूंगा तो वो कहेंगे 'तू तो बहुत ज्यादा पढ़ गया'... तो मैंने सोचा अच्छा है बस खेल देखूं और बियर पी लूं 😅

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    Rahul Raipurkar

    जुलाई 22, 2024 AT 09:54

    यह विवाद एक असली विचारधारात्मक उदाहरण है जिसमें व्यक्तिगत अहंकार और राष्ट्रीय अपेक्षाओं का टकराव दिखाई देता है। इरफान पठान का दृष्टिकोण एक भावनात्मक राष्ट्रवाद का प्रतिनिधित्व करता है, जबकि अमित मिश्रा का एक संस्थागत राष्ट्रवाद का। यह टकराव आधुनिक भारत के अस्तित्व के आधार को चुनौती देता है।

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    PK Bhardwaj

    जुलाई 22, 2024 AT 22:00

    संविधान एक जीवित दस्तावेज है, जिसे बस पढ़ने से नहीं, बल्कि अपने जीवन में उतारने से समझा जा सकता है। अमित मिश्रा का कहना सही है, लेकिन इरफान का भी भावनात्मक दृष्टिकोण अमूल्य है। दोनों को एक साथ लाना होगा - न्याय के साथ प्यार, नियमों के साथ आस्था।

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    Soumita Banerjee

    जुलाई 23, 2024 AT 19:50

    अरे भाई, ये सब बहस तो बस एक बॉलीवुड स्क्रिप्ट लग रही है... क्या एक क्रिकेटर को देश का संविधान पढ़ना चाहिए? या फिर उसे बस बल्ला घुमाना है? इस तरह की बातें करने वाले लोग खुद अपने घर की बिजली का बिल नहीं भर पाते।

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    Navneet Raj

    जुलाई 23, 2024 AT 22:19

    मैं तो ये कहूंगा कि अगर इरफान जी ने अपनी पोस्ट में थोड़ा नरम अंदाज़ अपनाया होता, तो अमित मिश्रा जी भी इतना जोर से जवाब नहीं देते। बात बात पर तलवार निकालने की जरूरत नहीं। बस एक दूसरे को सुनो, और खेल के लिए बाकी छोड़ दो।

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    Neel Shah

    जुलाई 25, 2024 AT 21:56

    अरे यार, अगर संविधान पढ़ना है तो फिर राजनेता क्यों नहीं पढ़ते? 😂 और इरफान का देश के बारे में कहना तो बिल्कुल ठीक है... अगर तुम्हारा देश बेकार है तो तुम क्या कर रहे हो? बस बाहर बैठे हो? अमित मिश्रा को अपनी बात तो बोलनी चाहिए, लेकिन इतना बड़ा टोन नहीं रखना चाहिए! 🙄

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    shweta zingade

    जुलाई 26, 2024 AT 04:42

    मैंने तो अमित मिश्रा के बारे में पढ़कर रो पड़ी! ये लोग जो बिना आवाज़ उठाए अपने देश के लिए लड़ रहे हैं, उन्हें हमें जागृत करना चाहिए! संविधान नहीं तो क्या है? हमारी आज़ादी की शुरुआत! इरफान जी को भी समझना चाहिए - देश के लिए प्यार करना तो बहुत अच्छा है, लेकिन उसे समझना भी जरूरी है! आज हमारे बच्चे नहीं जानते कि अगर बिना संविधान के हम क्या होते! 🙏

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    Pooja Nagraj

    जुलाई 28, 2024 AT 01:58

    यह घटना एक अत्यंत गहरी दार्शनिक विवाद का प्रतीक है - भावनात्मक राष्ट्रवाद बनाम संस्थागत लोकतंत्र। इरफान पठान का दृष्टिकोण एक रोमांटिक राष्ट्रवाद का है, जो निर्माण के लिए अपर्याप्त है। अमित मिश्रा का बिंदु, जो अनुशासन, ज्ञान और संस्थाओं पर आधारित है, वह एक स्थायी समाज की नींव है। इस विवाद को एक नाटकीय विरोध के रूप में नहीं, बल्कि एक जागृति के रूप में लेना चाहिए।

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    Anuja Kadam

    जुलाई 28, 2024 AT 23:01

    अमित मिश्रा ने जो कहा वो सही है... लेकिन इरफान भी गलत नहीं है। बस दोनों के बीच एक चाय का इंतजाम हो जाए तो बात सुलझ जाएगी। और हाँ, मैंने संविधान की एक पेज पढ़ी थी... फिर बारिश हो गई और मेरा फोन बंद हो गया 😅

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